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अफ्रीका के सिख क्यों जान निसार करते रहे धर्मेंद्र पर

धर्मेंद्र की पंजाबी जड़ें और देहाती छवि। धर्मेंद्र (जन्म: धर्म सिंह देओल) एक जाट सिख परिवार से थे। उनका लंबा क़द, गठीला बदन, गेहुँआ रंग और पंजाबी लहजा सिख युवकों को अपना लगता था।

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Dharmendra

बॉलीवुड अभिनेता धर्मेंद्र (फोटो सोशल मीडिया)

Dharmendra Passes Away: भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग कहे जाने वाले 1960-70 के दशक में जब बॉलीवुड के हीरो स्क्रीन पर रोमांस, एक्शन और ड्रामा का तड़का लगा रहे थे, तब हज़ारों मील दूर पूर्वी अफ्रीका के सिख समुदाय में एक नाम गूँजता था- “धर्मेंद्र ”। केन्या, युगांडा, तंज़ानिया और ज़ांज़ीबार के सिख बस्तियों में धर्मेंद्र कोई साधारण अभिनेता नहीं थे; वे एक सांस्कृतिक आइकन, भावनात्मक जुड़ाव और पंजाबी अस्मिता के प्रतीक थे।

धर्मेंद्र की अफ्रीका में लोकप्रियता

केन्या के महान हॉकी खिलाड़ी अवतार सिंह सोहल तारी अपने हीरो धर्मेंद्र की मृत्यु से गमगीन हैं। वे कहते हैं कि उनकी अफ्रीका में लोकप्रियता की जड़ें 20वीं सदी के शुरू में भारतीय प्रवासियों के उस समूह में खासतौर पर मिलती हैं जो ब्रिटिश साम्राज्य के रेलवे प्रोजेक्ट्स के लिए पूर्वी अफ्रीका लाए थे। इनमें अधिकांश रामगढ़िया सिख बढ़ई, लोहार और राजमिस्त्री थे। कड़ी मेहनत, अनुशासन और गुरबाणी के प्रति निष्ठा इनकी पहचान थी। 1940-50 के दशक तक ये समुदाय आर्थिक रूप से मज़बूत हो चुके थे और शहरों में गुरुद्वारे, पंजाबी स्कूल और सिनेमा हॉल उनकी सामाजिक ज़िंदगी के केंद्र बन गए थे।

हर रविवार को पंजाबी दर्शकों की भीड़

भारत के हॉकी प्रेमी भी अवतार सिंह सोहल तारी का नाम बड़े अदब से लेते हैं। उन्हें फिलवक्त संसार का महानतम सिख खिलाड़ी माना जाता है। उन्होंने 1960, 1964, 1968, और 1972 के ओलंपिक खेलों के हॉकी मुकाबलों में केन्या की नुमाइंदगी की है। फुल बैक की पोजीशन पर खेलने वाले तारी तीन ओलंपिक खेलों में केन्या टीम के कप्तान थे। वे बताते हैं कि बॉलीवुड फ़िल्में लंबे समय से अफ्रीका पहुँच रही हैं। नैरोबी के केन्या सिनेमा, दर- ए-सलाम के अवल सिनेमा और कंपाला के ओडियन थिएटर में हर रविवार को पंजाबी दर्शकों की भीड़ उमड़ती। लेकिन 1968-75 के बीच जो हुआ, वह अभूतपूर्व था। धर्मेंद्र की फ़िल्में—‘मेरा गाँव मेरा देश’, ‘प्रतिज्ञा’, ‘लूटेरा’, ‘जुगनू’, ‘कहानी ख़ानदान की’, ‘चरस’, ‘धर्म-वीर’—रिकॉर्ड तोड़ कमाई करने लगीं। नैरोबी के एक थिएटर मालिक ने 1974 में बताया था कि ‘प्रतिज्ञा’ को उन्होंने 42 हफ़्ते तक चलाया, जबकि आमतौर पर भारतीय फ़िल्में 4-6 हफ़्ते ही चल पाती थीं।

धर्मेंद्र को सिख समुदाय इतना क्यों चाहता था?

पहला कारण था उनकी पंजाबी जड़ें और देहाती छवि। धर्मेंद्र (जन्म: धर्म सिंह देओल) सहारनपुर ज़िले के एक जाट सिख परिवार से थे। उनका लंबा क़द, गठीला बदन, गेहुँआ रंग और पंजाबी लहजा सिख युवकों को अपना लगता था। जब वे स्क्रीन पर पगड़ी बाँधकर आते (जैसे ‘आसरा’ और ‘अनपढ़’ में कुछ दृश्यों में), या गाँव की मिट्टी से सने हाथों से डाकुओं को पीटते, तो दर्शक गुरुद्वारे के लंगर में बैठे अपने चाचाओं-ताऊओं को याद करते।

दूसरा, उनकी फ़िल्मों में पंजाबी संस्कृति की झलक। ‘मेरा गाँव मेरा देश’ में विनोद खन्ना के साथ उनका भाईचारा, ‘कहानी ख़ानदान की’ में पंजाबी परिवार की एकजुटता, ‘धर्म-वीर’ में

दोस्ती का पवित्र बंधन—ये थीम्स सिख समुदाय के मूल्यों से सीधे जुड़ती थीं। गुरु गोबिंद सिंह जी के बताए ‘दोस्ती में जान देने’ वाले सिद्धांत को धर्मेंद्र-जीतेंद्र की जोड़ी जीवंत कर रही थी।

तीसरा, उनकी मर्दानगी और विद्रोह। 1971 में इदी अमीन के युगांडा में सिखों-एशियाइयों पर जब ज़ुल्म बढ़ा, तब ‘प्रतिज्ञा’ (1975) में धर्मेंद्र का डायलॉग “मैंने प्रतिज्ञा ली है...” थिएटर में तालियों और “वाहेगुरु!” के नारों से गूँज उठता था। विद्रोह की यह भावना उस दौर के प्रवासी सिखों के मनोबल से मेल खाती थी।

चौथा, संयोग से धर्मेंद्र की कई फ़िल्में सिख कलाकारों से भरी होती थीं। निर्देशक सुंदर दर्शन (रामगढ़िया सिख), संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी (जिनके पिता युगांडा में बसे थे), पार्श्व गायक महेंद्र कपूर और नरेंद्र चंचल—सबका तालमेल एक “अपनापन” पैदा करता था।

सामाजिक स्तर पर भी इसका असर दिखा। नैरोबी के पंजाबी युवा धर्मेंद्र की तरह लंबे बाल रखने लगे (फिर पगड़ी बाँधते), और सफ़ेद कुर्ता-पायजामा और काले चश्मे का चलन बढ़ा। शादियों में “यारी है इमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी” बजना अनिवार्य हो गया। 1970 के दशक में कई सिख बच्चों का नाम “वीरू” और “जय” रखा गया।

यह लोकप्रियता केवल सिखों तक सीमित नहीं थी, लेकिन सिख समुदाय में यह सबसे गहरी थी। युगांडा से निकाले गए सिख जब 1972-73 में ब्रिटेन और कनाडा पहुँचे, तो उन्होंने यह सांस्कृतिक विरासत साथ ले गए। आज भी लंदन, वैंकूवर और टोरोंटो के पुराने सिख धर्मेंद्र को “अपना हीरो” कहते हैं।

धर्मेंद्र ने स्वयं एक बार कहा था, “मुझे पता चला कि अफ्रीका में मेरी फ़िल्में बहुत चलती हैं, ख़ासकर सिख भाइयों में। मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि मैं पगड़ी वाले भाइयों का दिल जीत सका।” यह वाक्य उनकी लोकप्रियता का सबसे सच्चा प्रमाण है।

आज जब हम सोचते हैं कि बॉलीवुड का ग्लोबल प्रभाव नेटफ्लिक्स और यूट्यूब से शुरू हुआ, तो भूल जाते हैं कि 50 साल पहले पूर्वी अफ्रीका के गुरुद्वारों के बाहर लगे फ़िल्म पोस्टरों पर एक लंबा-चौड़ा पंजाबी हीरो मुस्कुरा रहा था—और उस मुस्कान में पूरा सिख समुदाय अपना चेहरा देखता था। सोहल बताते हैं कि केन्या की हॉकी टीम के खिलाड़ी जब भी मुंबई में 1970 और 1980 के दशकों में खेलने जाते तो वे धर्मेंद्र के घर अवश्य मिलने जाते। वहां उन्हें भरपूर प्यार मिलता।