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बसपा सुप्रीमों मायावती ने उड़ाई विपक्षियों की नींद, 6 दिसंबर को फिर गरमाएगी प्रदेश की राजनीति…खोया वर्चस्व हासिल करना बड़ी चुनौती

बीएसपी सुप्रीमो मायावती वर्ष 2027 यूपी विधान सभा चुनावों को लेकर काफी अलर्ट मोड में हैं। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अपना खोया हुआ वर्चस्व हासिल करना चाहती है,इसलिए लगातार अपनी ताकत दिखाने में जुटी हैं।

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फोटो सोर्स: सोशल इमेज, 6 दिसंबर को बसपा की रैली

यूपी की राजनीति का ताप एक बार फिर बढ़ने वाला है, बिहार में बसपा की एक सीट मिलने के बाद सुप्रीमों मायावती का ध्यान अब पंचायत चुनावों और 2027 की यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर है।बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस 6 दिसंबर को बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो मायावती नोएडा में एक विशाल रैली करने जा रही हैं।

14 साल बाद गृह जनपद में करेंगी शक्ति प्रदर्शन

बता दें कि की लखनऊ में पिछले दिनों आयोजित हुई महारैली में भारी भीड़ पहुंचने से उत्साहित मायावती अपने गृह जनपद गौतमबुद्ध नगर में 14 साल बाद शक्ति प्रदर्शन करेंगी। इतना ही नहीं, मायावती 6 दिसंबर को होने वाली रैली में अपनी ताकत दिखाएंगी और विरोधियों को साफ-साफ संदेश देंगी कि उनका कोर वोट बैंक आज भी उनके पास है, वो उनके पास से खिसका नहीं है। गौतमबुद्ध नगर में होने वाली मायावती की रैली न सिर्फ बसपा की संगठनात्मक ताकत का प्रदर्शन माना जा रहा है, बल्कि इसे मायावती की दुबारा वापसी की तैयारियों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। इस रैली के जरिए मायावती नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ और बुलंदशहर में अपने वोट बैंक को मजबूत करने की जुगत में हैं। लखनऊ की रैली ने जिसने बसपा कार्यकर्ताओं को एक नई ऊर्जा दी है। बीएसपी ने बिहार चुनाव अपने दम पर चुनाव लड़ा और एक सीट जीतकर यह जताने की कोशिश की कि पार्टी फिर अपने पुराने आक्रामक तेवरों में लौट रही है।

नोएडा रैली को 'शक्ति प्रदर्शन 2.0' मान रही बसपा

गौतमबुद्ध नगर में होने वाली रैली के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियां चल रही हैं। जिलों और मंडलों के कोऑर्डिनेटर्स को अधिकतम भीड़ जुटाने का टारगेट दिया गया है। बीएसपी देशभर से नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी शामिल करने की योजना बना रही है। लखनऊ रैली की सफलता के बाद पार्टी इस नोएडा रैली को 'शक्ति प्रदर्शन 2.0' मान रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती इसी मंच से मिशन 2027 का आगाज करेंगी, बता दें कि साल 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में बीएसपी का मत प्रतिशत दहाई तक भी नहीं पहुंचा था और पार्टी का कोई भी नेता लोकसभा में नहीं पहुंच सका था।