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एसडीएम से पूछा आरसीए के बारे में, नहीं बता पाई स्वरूप, कोर्ट ने क्या ऐसे अधिकारी अर्ध न्यायिक शक्तियां सौंपी जानी चाहिए

The court also imposed a fine of Rs 50,000 and ordered a copy of the order to be mentioned in the service book.

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The court also imposed a fine of Rs 50,000 and ordered a copy of the order to be mentioned in the service book.

The court also imposed a fine of Rs 50,000 and ordered a copy of the order to be mentioned in the service book.

हाईकोर्ट की एकल पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए गुना की रेंट कंट्रोलिंग अथॉरिटी (आरसीए) व एसडीएम गुना शिवानी पाठक के आचरण को मलाफाइड और अर्ध न्यायिक अधिकार (क्वासी ज्यूडिशियल) का दुरुपयोग बताया। कोर्ट ने कहा कि आरसीए द्वारा रिकॉर्ड न भेजने का उद्देश्य स्पष्ट रूप से यह था कि आवेदकों को हाईकोर्ट से स्टे आदेश प्राप्त न हो सके। सुनवाई के दौरान शिवानी पाठक न्यायालय में मौजूद थी। कोर्ट ने जब उनसे आरसीए का पूरा नाम पूछा गया तो वे इसका पूरा स्वरूप भी नहीं बता सकीं। अदालत ने टिप्पणी की कि यह राज्य सरकार का निर्णय होगा कि क्या ऐसे अधिकारी को अर्ध न्यायिक अधिकार सौंपे जाएं या नहीं। उनके ऊपर 50 हजार रुपए का हर्जाना भी लगाया, जिसे 15 दिन के भीतर जमा करना होगा। इसके अलावा आदेश की कॉपी उनकी सर्विस बुक में रखी जाएगी। आदेश की कॉपी मुख्य सचिव को भी भेजी जाएगी।

दरअसल गुना में निशांत श्रीवास्तव व मनीषा जैन के बीच मकान खाली करने को लेकर विवाद चल रहा है। मनीषा ने आरसीए के समक्ष मकान खाली कराने का आवेदन किया, जिस पर आरसीए ने आदेश पारित कर दिया। इसको लेकर निशांत श्रीवास्तव ने हाईकोर्ट में सिविल रिवीजन दायर की। उनकी ओर से तर्क दिया कि आरसीए को आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है। इसके लिए न्यायालय में सिविल सूट दायर करना होता है। कोर्ट ने पूरी कार्रवाई का रिकॉड तलब किया था। रिकॉर्ड नहीं आने पर एसडीएम गुना को तलब कर लिया।

रिकॉर्ड हो गया था गुम

अदालत ने शिवानी पाठक ने कोर्ट में स्पष्टीकरण दिया। बताया कि रिकॉर्ड गुम हो गया था। कोर्ट ने इसे गलत बताते हुए उनके आचरण की निंदा की और उन्हें 50,000 रुपए की हर्जाना (कॉस्ट) जमा करने का निर्देश दिया। यह राशि 15 दिनों के भीतर हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करनी होगी। राज्य सरकार इस लागत की प्रतिपूर्ति नहीं करेगी। निर्धारित समय में राशि जमा न होने पर प्रिंसिपल रजिस्ट्रार को वसूली की कार्रवाई और अवमानना का मामला दर्ज करने का निर्देश दिया गया है।

- शिवानी पाठक द्वारा दी गई लिखित स्पष्टीकरण में स्वीकार किया गया कि 9 दिसंबर 2024 को मांगा गया। रिकॉर्ड 17 दिसंबर 2024 को प्राप्त हुआ था, लेकिन इसके बावजूद रिकॉर्ड भेजा नहीं गया। आवेदकों के वकील ने बताया कि इस बीच उन्हें मकान से बेदखल भी कर दिया गया। अदालत ने माना कि आरसीए द्वारा रिकॉर्ड को रोके रखना जानबूझकर किया गया कदम था ताकि अपीलकर्ता स्टे न ले सकें। ऐसा करके

- कोर्ट ने आरसीए की कार्रवाई पर रोक लगा दी। याचिका की सुनवाई 20 जनवरी को होगी।