
गालिब की शायरी के दीवाने श्रीप्रकाश जायसवाल के 'अनकहे' सच! फोटो सोर्स- पत्रिका न्यूज
Shriprakash Jaiswal: पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का शुक्रवार (28 नवंबर) को कानपुर में कार्डियक अरेस्ट से निधन हो गया। वे 81 साल के थे। शाम को जायसवाल की तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें किदवई नगर के एक नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया। बाद में उन्हें कार्डियोलॉजी हॉस्पिटल ले जाया गया। जहां डॉक्टर्स ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। आपके बताते हैं श्रीप्रकाश जायसवाल के बारे में….
श्रीप्रकाश जायसवाल तत्कालीन केंद्र सरकार में गृह और कोयला मंत्री रह चुके थे। वह गालिब और फैज अहमद फैज की शायरी के बड़े प्रशंसक थे। गालिब के कई शेर उन्हें जुबानी याद थे। सोने से पहले अपने मनपसंद शायरों को पढ़ना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। कानपुर में रहते समय यदि उन्हें किसी कवि सम्मेलन या मुशायरे का न्योता मिलता, तो वे बिना किसी विशेष औपचारिकता के वहां पहुंच जाते और शांति से दर्शकों के बीच बैठकर कार्यक्रम का आनंद लेते।
श्रीप्रकाश जायसवाल 3 बार कानपुर से सांसद चुने गए, दो बार केंद्र में मंत्री बने और लंबे समय तक कांग्रेस की उत्तर प्रदेश इकाई के कोषाध्यक्ष भी रहे। हालांकि यह उनका आधिकारिक परिचय है, लेकिन उनकी पहचान इससे कहीं आगे जाती थी जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी। वह अपनी सादगी और विनम्र स्वभाव के लिए जाने जाते थे।
श्रीप्रकाश जायसवाल का जन्म कानपुर में एक साधारण वैश्य परिवार में हुआ था। उनके पिता, श्री रामस्वरूप जायसवाल, छोटे स्तर पर कारोबार करते थे। उनके परिवार में ना कोई विशेष राजनीतिक पृष्ठभूमि थी और ना ही कोई बड़ा रसूख। उनकी शुरुआती शिक्षा कानपुर में ही हुई और उन्होंने DAV कॉलेज से B.Com. तक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वे अपने पारिवारिक व्यवसाय से जुड़ गए। केनाल रोड स्थित डाल मिल का दफ्तर ही वह स्थान था, जहां अक्सर उनके मित्र राजनीतिक चर्चाओं के लिए इकट्ठा होते थे।
उनके बचपन के साथी सरदार मदन गोपाल बताते हैं कि श्रीप्रकाश जायसवाल ने राजनीति की शुरुआत कांग्रेस की युवा इकाई से की। एक साधारण कार्यकर्ता से लेकर शहर कांग्रेस अध्यक्ष तक की उनकी यात्रा बिना किसी शोर-शराबे के, धीरे-धीरे और पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ती गई। उनकी यही सरलता और शांत स्वभाव उनके राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी पहचान बन गई।
श्रीप्रकाश जायसवाल ने 1999 में पहली बार कानपुर लोकसभा सीट पर जीत हासिल की। इसके बाद 2004 और 2009 के चुनावों में भी उन्होंने लगातार जीत दर्ज की। हर चुनाव में उनकी जीत का अंतर बढ़ता चला गया।
1999 में लोकसभा चुनाव में भाजपा के सांसद जगतवीर सिंह द्रोण सहित सभी को पछाड़कर श्रीप्रकाश कांग्रेस की टिकट पर 46 प्रतिशत से अधिक वोट पाकर पहली बार सांसद बने। 1998 में उन्हें सिर्फ 13 फीसदी वोट मिले थे। 2004 में फिर से लोकसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के सत्यदेव पचौरी को हराकर जीत हासिल की। 2009 के लोकसभा चुनाव में वह भाजपा प्रत्याशी सतीश महाना को हराकर सांसद बने। 2014 के लोकसभा चुनाव में वह भाजपा के पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी से चुनाव हार गये।
तीन बार शहर के सांसद रहने के दौरान जायसवाल ने बुनियादी ढांचे विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। जाम से जकड़े शहर को आवागमन में राहत के लिए उन्होंने तीन फ्लाईओवर का निर्माण शुरू किया। औद्योगिक शहर की कनेक्टिविटी बेहतर करने के लिए उन्होंने शहर में पहली बार उड़ान सेवा शुरू करवाई। उद्योगों को बढ़ावा दिया। चार नई ट्रेनों की भी शहर को सौगात दी।
2004 से 2014 तक वे मनमोहन सिंह सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के साथ जुड़े रहे। पहले उन्हें गृह मंत्रालय और बाद में कोयला मंत्रालय में स्वतंत्र प्रभार का राज्य मंत्री बनाया गया। साल 2009 में वे कोयला मंत्रालय के पूर्ण कैबिनेट मंत्री बने। कोयला घोटाले के दौरान विपक्ष ने उन्हें कड़ी आलोचना का निशाना बनाया, लेकिन जांच एजेंसियों ने हर बार उन्हें क्लीन चिट दी। CAG रिपोर्ट में जिन परियोजनाओं पर विवाद उठा, उनमें से ज्यादातर आवंटन 2004 से पहले के थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी सफाई देने की कोशिश नहीं की। वे चुपचाप जांच का सामना करते रहे और अंत तक अपना सिर ऊंचा रखा—शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।
राजनीति से परे भी उनके व्यक्तित्व के कई अनछुए पहलू थे। वे बेहद पढ़ने-लिखने वाले व्यक्ति थे। उनके घर में एक बड़ा निजी पुस्तकालय था, जहां वे घंटों अध्ययन में डूबे रहते।
वे अपने परिवार को राजनीति से दूर रखने के सिद्धांत पर हमेशा कायम रहे। उनके बेटे और बेटी—दोनों ही व्यवसाय से जुड़े हैं। उन्होंने कभी अपने परिवार या किसी परिचित के लिए राजनीतिक टिकट या पद की सिफारिश नहीं की। एक बार जब कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने अपने बेटे के लिए उनसे मदद मांगी, तो वे मुस्कराकर बोले, ''मेरे बच्चे भी तो बाहर से ही मेहनत कर रहे हैं, फिर दूसरे का क्या हक बनता है?''
कानपुर की गलियों में आज भी लोग उन्हें स्नेह से श्रीप्रकाश भैया कहकर याद करते हैं। वे कभी प्रोटोकॉल में बंधे नहीं। मंत्री रहते हुए जब भी कानपुर आते, अपने पुराने मोहल्ले में चाय की टपरी पर बैठकर कुल्हड़ में चाय पीते और लोगों की समस्याएं सुनते। 2014 के चुनाव में हार के बाद भी उन्होंने यह सिलसिला नहीं छोड़ा। बिना सत्ता के भी वे पूरे 5 साल हर रविवार को अपने पुराने दफ्तर में जनता दरबार लगाते रहे।
उनकी जीवनशैली सादगी की मिसाल थी। वे रोज सुबह 5 बजे उठकर टहलने जाते थे। शाकाहारी थे और शक्कर की जगह मिश्री लेते थे। 70 साल की उम्र पार करने के बाद भी बिना चश्मे के अखबार पढ़ लेते थे। कोयला मंत्रालय में रहते समय जब डॉक्टर्स ने ब्लड प्रेशर की दवा शुरू करने की सलाह दी, तो उन्होंने दवा की बजाय हर सुबह आंवले का जूस पीना शुरू कर दिया।
उनका हास्यबोध भी कमाल का था। एक बार संसद में जब विपक्ष ‘कोलगेट’ मुद्दे पर जमकर हंगामा कर रहा था, तो वे मुस्कुराकर बोले, ''मैं कोयला मंत्री हूं, कोलगेट तो पतंजलि बनाता है।'' उनकी इस बात पर पूरा सदन ठहाकों से गूंज उठा। वे कभी किसी पर व्यक्तिगत प्रहार नहीं करते थे। यह उनके व्यक्तित्व की खास पहचान थी।
Updated on:
29 Nov 2025 08:10 pm
Published on:
29 Nov 2025 12:10 pm
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